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 साईको (हिंदी में)


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ए.टी.ज़ाकिर का रचनासंसार


The Wonderful World Of A.T.Zakir


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साईको ही क्यों !


 

नोट: यदि आपका दिल कमज़ोर है तो कृपया आप इस कथा को न पढ़ें |

साइको

 

A.T.Zakir

ए.टी.ज़ाकिर


साठ का दशक हॉरर सिक्स्टीज़ के नाम से जाना जाता है  क्योंकि यह वह काल था जब एल्फ्रेड हिचकॉक की ‘साईको’ और ‘बर्ड्स’ नामक फिल्मों ने सिनेमा के दर्शकों का उस भय से सामना कराया जिसके स्मरण मात्र से इन फिल्मों के दर्शक आज भी भय की सिहरन अपनी रीढ़ की हड्डी में महसूस करते हैं | ‘दि हाउस ऑफ वैक्स’ और ‘हॉररस ऑफ ड्रैकुला’ के भय का अपना अलग साम्राज्य था | कुल मिलाकर इस काल की विशेषता थी सिने-दर्शक को डराना | ‘थ्री-डी टेकनीक की फिल्मों ने अपनी विशेष फोटोग्राफी और ज़बरदस्त पार्श्व संगीत से इस भय को और भी अधिक जीवंत और मुखर बना दिया था |

 

मैंने ‘साईको’ फिल्म नहीं देखी थी | उसके विषय में सुना अवश्य था | मैं उससे दो-चार भी होना चाहता था | मगर भाग्य ने कुछ ऐसा किया कि इस फिल्म को मैं देख ही नहीं पाया और कमाल की बात यह है कि आज तक नहीं देख सका हूँ | इस फिल्म का नाम मुझे सदैव अपनी ओर खींचता रहता था | एकाएक एक बार रेलवे स्टेशन पर ‘व्हीलर शॉप’ पर मुझे ‘साईको’ अंग्रेज़ी के नॉवल की प्रति पेपर बैक में नज़र आयी, तो मैंने जाना कि इस उपन्यास के लेखक का नाम रॉबर्ट ब्लौच है और इसी उपन्यास पर एल्फ्रेड हिचकॉक ने वह भयानक फिल्म बनाई थी | मज़े की बात यह है कि इस उपन्यास को देखने से पहले मैं यही समझता था कि साईको का लेखन एल्फ्रेड हिचकॉकने किया है |

 

मैंने उपन्यास खरीदा और पढ़ा, शायद उस समय मैं इंटरमीडिएट का छात्र था | और लेखन मैं पहले से ही करता आ रहा था |

 

‘साईको’ ने मुझे भीतर तक हिला कर रख दिया | पहली बार जब मैंने इसे पढ़ा तो भय और रोमाँच की सिहरन ने मुझे जकड़ लिया | मैंने एक नये तरीके के भय को ज़िन्दा अपने सामने पाया | सच कहूँ तो मैं भी काफ़ी डर गया | अब मुझे स्पष्ट रूप में यह अनुभव हो गया कि जब उपन्यास को पढ़ने मात्र से ही मैं इतना डर सकता हूँ तो जिन लोगों ने इस फिल्म को देखा होगा उनका क्या हाल हुआ होगा |

 

बाद में, सत्तर के दशक के आते-आते मैं इस उपन्यास को कम से कम ६ – ७ दफा खरीद चुका था और हर बार पढ़कर किसी न किसी को पढ़ने को दे चुका था | अब यह यहाँ कहने की बात है कि पढ़ने के बाद किसी ने मुझे इस उपन्यास को नहीं लौटाया |

 

1972 में मनोविज्ञान प्रकाशन के मेरे मित्र श्री ओम प्रकाश गुप्त जी ने और मेरे बहुत सारे मित्रों और प्रशंसकों ने मुझसे ‘साईको’ को हिंदी में अनुदित करने को कहा | मेरे हामी भरने पर मनोविज्ञान प्रकाशन ने ‘साईको’ के सर्वप्रथम हिंदी अनुवाद को छापने का ज़िम्मा उठा लिया और अनुवाद की औपचारिकतायें उन्होंने प्रारम्भ कर दीं | अब काम मेरा था, मुझे इस अंग्रेज़ी उपन्यास का हिंदी में अनुवाद करना था |

 

एक बार फिर ‘साईको’ की नई प्रति खरीदी गई और पूरे मनोयोग से उसे पढ़ा गया | इस बार पढ़ने का नज़रिया अलग था, इसलिये मुझे भय के साथ-साथ एक नये रस करुणा का भी स्वाद मिला | मैंने पहली बार यह जाना कि हम किसी जघन्य अपराधी या हत्यारे के प्रति भी करुणा या संवेदना का अनुभव कर सकते हैं यदि लेखक ने अपराधी के मन और परिस्थितियों में गहरी पैठ बनाई हो | साथ ही मैंने इस भयानक अंग्रेज़ी उपन्यास के अत्यंत जटिल मनो वैज्ञानिक पहलू को भी पढ़ा और समझा | किन्तु अभी अनुवाद कहाँ था पहले तो मुझे इस कथानक को समझना था जो कि मेरी आदत है | अत: मैंने इस नॉवल के कथानक और मनोवैज्ञानिक जटिलताओं को बहुत से मनोविज्ञान के प्रोफेसरों और मनोवैज्ञानिकों से समझा |

 

अब अनुवाद करना और भी कठिन लगने लगा | यह तो तिल की ओट में पहाड़ होने जैसी बात लगने लगी | जिस उपन्यास को मैं साधारण भय और रोमाँच का उपन्यास समझ रहा था वह तो अब मनोविज्ञान की एक बड़ी समस्या का स्त्रोत दिखने लगा | मैंने सोचना बंद कर दिया और जुट गया अनुवाद करने में | मैंने सोचा अगर हो जायेगा तो कर लूँगा नहीं तो माफ़ी माँग लूँगा | यह कोई ज़रुरी तो नहीं है कि मैं हर कहानी या उपन्यास का अनुवाद कर सकूं | सात दिनों के दिन-रात के परिश्रम के बाद ‘साईको’ के सर्वप्रथम हिंदी अनुवाद का जन्म हुआ जिसे मनोविज्ञान प्रकाशन ने ऋचा पॉकेट बुक्स में छापा |

 

अनुवाद बहुत सराहा गया | हिंदी के पाठक भय से सिहर उठे और प्रथम संस्करण की बिक्री भी अच्छी रही | तभी ‘प्रभायन हिंदी डाइजेस्ट’ के प्रधान सम्पादक स्वर्गीय श्री ललित मोहन भारद्वाज जी ने इस उपन्यास का सार-संक्षेप माँगा जो मैंने कर दिया फिर वह उनकी पत्रिका में प्रकाशित भी हुआ और बहुत पसंद किया गया |

 

इसी अंग्रेज़ी उपन्यास ‘साईको’ का संक्षिप्त हिंदी अनुवाद आपके सामने इस वेबसाइट पर है | एल्फ्रेड हिचकॉक ने फिल्म बनाते समय कथानक व पात्रों में कुछ परिवर्तन किये हैं ऐसा मैंने सुना है चूँकि मैंने इस फिल्म को नहीं देखा इसलिये मैं इस विषय पर कुछ भी नहीं कह सकता |

    
 

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